ये वक्त

ये वक्त
जो तुम्हारे लिए
नए हसीन सपने बुन रहा है
धीमे धीमे तुम्हारे आज को
कल में बदल रहा है
इस पर एतबार न करना
ये छलिया तुम्हें
फिर उसी पुराने अंदाज़ से छल रहा है

ये वक्त
जो तुम्हारी नसों में पल रहा है
तुम्हारी धमनियों में बह रहा है
इस पर मान ना करना
ये पल पल रिसता हुआ
तुमसे होता हुआ गुज़र रहा है
तुम्हें इस्तेमाल कर रहा है

ये वक्त
जिसकी चाप सुन रहे हो तुम
जिसकी आगोश में जकड़े हो तुम
आज कहता है तुमसे
मैं खुद नहीं बीत रहा
मुझमें पल पल, कण कण बीत रहे हो तुम

पेड़ काटो

साहेब ने शहर के बाहर
बड़ी झील के किनारे
एक फॉर्महाउस लिया है।

हां! वहां तक पहुंचने में
पूरा घंटा खर्च हो जाता है।
सड़क बहुत संकरी है
एक बार में सिर्फ़ दो ट्रक निकल पाते हैं।

सड़क किनारे
विकास में रोड़े अटकाए
आवाजाही में असुविधा पैदा करते
कितने पुराने बरगद
कितनी सारी ज़मीन घेरे बैठे हैं।

साहेब का कहना है कि
सरकार को इस विषय में गौर करना चाहिए।
इन में से कुछ अगर काट दिए जाएं
ज़्यादा नहीं, यही कोई सौ, सवा सौ
कम से कम दस मिनट बच सकेंगे
दस बहुमूल्य मिनट।

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रहा हूं मैं

 

बदन की ज़रूरतों में उलझा रहा हूं मैं
अपना मकसद हमेशा भूला रहा हूं मैं

काटी है मैंने ज़िंदगी बस दौड़ भाग में
फूलों की सेज पे अब सुस्ता रहा हूं मैं

भटका इस तरह, अपना पता नहीं मुझे
सारी दुनिया को रास्ता दिखा रहा हूं मैं

भूला हूं हर चेहरा इस शीश महल में
सबको आइना अब दिखला रहा हूं मैं

थे कठिन बहुत मस’अले रोज़गार के
सो सलीके दूसरों को सिखा रहा हूं मैं

कोई गिला नहीं मुझको तुमसे अब रहा
खुद कौन सा दूध का धुला रहा हूं मैं

जो खो गया उसको खोने का गम तो है
हां! दिल को फिर भी समझा रहा हूं मैं

Remembrance

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