आ गए

थक गए थे चलते चलते, घर आ गए
देखते हैं दीवार-ओ-दर, किधर आ गए

हमारे काफ़िले को किसकी नज़र लगी
एक सहरा खोजते थे औ’ शहर आ गए

अपने खूँ से सींचा इस बाग को ताउम्र
क्यूं हर शजर के हाथ में पत्थर आ गए

हर शख़्स देखता है हिकारत से क्यू हमें
ये कैसी महफ़िल है, हम किधर आ गए

हमारे अहद का यहां नहीं है कोई मोल
खूब जानते थे हम, देखो मगर आ गए

क्या बताएं कैसे ऐश से रहते थे हम वहां
क्या कहें क्यूं छोड़ गांव, नगर आ गए

माना बहुत कठिन है जीना इस दौर में
फिर भी कुछ कर चलो, अगर आ गए

हम दोनों

इक सदी से प्यासी धरती की आरज़ू हम दोनों
गंगा जमुना सरस्वती और सरजू हम दोनों

जेठ की गर्म दुपहरी में चलती हुई लू हम दोनों
पहली पहली बारिश का महका जादू हम दोनों

दूर चमकती कहकशां में हर-सू हम दोनों
चांद, सितारे, कंदीलें, दीपक, जुगनू हम दोनों

वीराने जंगल में फिरते आखिरी आहू हम दोनों
सावन में पीले सरसों की मादक खुशबू हम दोनों

मुस्कान, गुस्सा, खामोशी, दर्द, आंसू हम दोनों
कोमल दिल, मज़बूत कांधे, सख़्त बाज़ू हम दोनों

बेहतर दिनों के

बेहतर दिनों के नए इम्कान दिखाते हैं
है अंधेरा बहुत चलो कोई दीप जलाते हैं

यारों तुम्हारे शहर में अब जी न सकेंगे
इंसाॅं नहीं कोई, यहां सब खुदा कहाते हैं

ये जो आज बुलंदियों पे फिरते हो इतराते
आओ तुम्हारी तुमसे पहचान कराते हैं

इक तुम कि खफ़ा हो जाते हो यारों से भी
इक हम कि दुश्मन को भी गले लगाते हैं

ये ऐसा जज़्बा है जो मर कर नहीं मिटता
अहले वफ़ा जां दे के भी अहद निभाते हैं

कलेजा चाहिए होता है मुस्कुराने में लोगों
अश्कों का क्या है, ये यूं ही चले आते हैं

यारों दुआ करो

हर लम्हा खिलखिलाता रहे, यारों दुआ करो
उसे किसी की नज़र न लगे, यारों दुआ करो
 
मैंने माना वो मेरा हमराह नहीं अब मगर
थोड़ी दूर मेरे साथ तो चले, यारों दुआ करो
 
जो दर पे मेरे कांटे बिखेर गया, उसकी
राहों में गुल ही गुल खिलेंं, यारों दुआ करो
 
रख दिया है अपना हाथ मेरे हाथ में उसने
ये हाथ अब ताउम्र ना छूटे, यारों दुआ करो
 
बसते जाते हैं शहर, हुए जाते हैं जंगल गुम
कोई शजर ना बेवजह कटे, यारों दुआ करो
 
जिस तरह इक शाम हुआ था जुदा मुझसे
यकायक कहीं वो आ मिले, यारों दुआ करो
 
मेरे हाल पे हंसने वालों में शरीक थे तुम भी
कभी कोई तुम पे ना हंसे, यारों दुआ करो

ना मिल सकी

तुझे रौशनी की थी तलब, मेरा तीरगी से था वास्ता
ना तेरे नसीब में था आफ़्ताब, ना मुझे रात मिल सकी

रही आंधियाँ मुक़ाबिल मेरे चिराग के रात भर
ना थमी उनकी जुल्मतें, ना मेरी आग बुझ सकी

ना जाने कितनी ख्वाहिशें दफ़्न दोनों दिलों में थीं
ना तू गले से लग सका, ना मेरी ज़ुबां ही खुल सकी

था फ़ासला अना का, हम दोनों के दरम्यान
ना तेरा गुरूर ही कम हुआ, ना मेरी आंख झुक सकी

रही उम्र भर शिकायतें मुझे अपने ही अक्स से
ना मिटा सका मैं आइना, ना ये शक्ल ही बदल सकी

वो जो महल था रेत का, कल बारिशों में बह गया
ना हाथ आया वो ख्वाब ही, ना नींद ही मिल सकी

यारों

दबे पांव उतरती है आंगन में शाम यारों
पड़े हैं मेरे सामने कुछ टूटे हुए जाम यारों

ना देखा उसने ही पलट के हमारी ओर
ना हमसे ही लेते बना उसका नाम यारों

बा’द मुद्दत आई याद आज हमारी तुमको
क्या फिर निकल आया कोई काम यारों

किताबें, महफिलें, जाम-ओ-सागर, शायरी
इक टूटे दिल को क्या क्या इंतज़ाम यारों

ठीक है ये ज़िद्द भी कि कोई रोके ना तुम्हें
जाते जाते लेते जाओ आखिरी सलाम यारों

कल भरी महफ़िल मैं देर तक तन्हा रहा
दिया दोस्ती का तुमने अच्छा ईनाम यारों

खुल के

तुम्हारे बाद किसी को चाहा नहीं खुल के
जश्न ए ज़िंदगी फिर मनाया नहीं खुल के

मैं जानता था वो निकलेगा बेवफ़ा सो
मैंने हाल-ए-दिल उसे बताया नहीं खुल के

हुआ है जिसके हुनर का दीवाना ये जहां
एक भी गीत उसने गाया नहीं खुल के

लुत्फ तेरी नाराज़गी का खो न जाए कहीं
हमने इस डर से तुझे मनाया नहीं खुल के

बताएंगे किस किस को ये राज़ भला हम
तूने हमको गले से लगाया नहीं खुल के

हो सके तो कोई ग़ज़ल सुनाते जाओ इसे
‘ओझल’ इक उम्र से मुस्कुराया नहीं खुल के

नहीं होगा

यूं कदम कदम पर संभलने से नहीं होगा
ये इश्क है मियां! ऐसे डरने से नहीं होगा

चाहते हो बेहतर दुनिया तो बदलो खुद को
ये काम सिर्फ़ दुनिया बदलने से नहीं होगा

ज़रा पहचान रास्तों की भी ज़रूरी है लोगों
हासिल-ए-मंज़िल यूं ही चलने से नहीं होगा

मज़ा तो तब है कि जहां को रौशनी मिले
और तो कुछ हमारे जलने से नहीं होगा

जब मुझसे ख़फ़ा हैं मेरे अपने ही ‘ओझल’
मैं जानता हूं फ़ायदा सुधरने से नहीं होगा

चल

मन छोड़ अंधेरों की छांव चल
चल आज रौशनी के गांव चल

कोई रास्ता ना दे दिखाई तुझे
तू रख के बादलों पे पांव चल

वक्त से जीत सका कौन यहां
तू फिर भी मगर इक दांव चल

एक कहानी

बड़ी पुरानी बात है
यहां से बहुत दूर
एक नदिया बहती थी
उस नदिया के तट पर
एक छोटा सा गांव था।

दूर नदी के तट पर
जो छोटा सा गांव था
उस गांव के कोने में
एक पुराना घर था।

दूर गांव के कोने में
जो पुराना घर था
उस घर में एक आंगन था
आंगन में एक पेड़ था।

दूर घर के आंगन में
एक पेड़ की एक डाल पे
एक गौरय्या रहती थी।
उस गौरय्या ने
एक घोंसला बनाया था
घोंसले में उसके नन्हे मुन्ने बच्चे थे।

आंगन के पेड़ की डाल पे
गौरय्या के घोंसले में
बच्चे दिन भर खेलते थे
खूब शोर मचाते थे।

गौरय्या के बच्चे
खेलते कूदते बड़े हुए
और फिर वो उड़ गए।

नदिया अब भी बहती है
इक कहानी कहती है।
उस कहानी में अब भी
दूर नदी के तट पर
एक सूना सा गांव है
उस गांव के कोने में
एक वीराने घर के
सुनसान आंगन में
एक पुराने पेड़ की
डाल पे एक खाली सा
गौरय्या का घोंसला है।