मेरे शहर के लोग

मिट्टी के घरौंदे बनाते मेरे शहर के लोग
बारिश में हैं पछताते मेरे शहर के लोग

करने को कोई काम नहीं, बैठे हैं खाली
बातें बड़ी बड़ी बनाते मेरे शहर के लोग

नहीं है मालूम अपने पड़ोसियों के नाम
दुनिया को अपना बताते मेरे शहर के लोग

सोशल मीडिया पे देते सबको बड़ा ज्ञान
काम किसी के ना आते मेरे शहर के लोग

ये मत खाओ, वो मत पहनो, इसे ना देखो
हर जगह पाबंदी लगाते मेरे शहर के लोग

माथे हाथों की रेखाओं पे डालते दोष सारे
विश्वगुरु ज्ञानी कहलाते मेरे शहर के लोग

शहर का शहर ही सोया हुआ है

शहर का शहर ही सोया हुआ है
जैसे इसे सुबह से खतरा सा है

मैं एहतराम तो कर लूं उसका
वो किस की धुन में खोया है

तेरी याद के पंछी उतरे छत पर
जाने शाम का इरादा क्या है

कहने को अपना है सारा जहां
देखिए गौर से अपना क्या है

उम्र भर दौड़ते रहे और पाया
खोई मंज़िल, रास्ता, कारवां है

आ के लग जा गले ऐ अज़ल
दिल मेरा अब डूबता जा रहा है

दम तोड़ती है हर ख्वाहिश मेरी
ये किस मोड़ पर मुझे तू मिला है

समंदर

है मेरे अंदर जो ये अथाह समंदर
कर देगा सब कुछ तबाह समंदर

तेरी आंखों में जो दरिया हैं तो हों
मेरी सांसों का है मल्लाह समंदर

उतरो जो इसमें तो देख कर उतरो
कर दे ना तुमको गुमराह समंदर

मैं ढूंढ़ता फिरता हूं रौशनी के कतरे
किस्मत में है मेरी सियाह समंदर

भाग रहा हूं मैं हार के इस जहां से
शायद मुझे देगा अब पनाह समंदर

इक सदी से मैं खुद से जूझ रहा हूं
नाकामियों का मेरी गवाह समंदर

 

दोस्तों अलविदा

अब जाते हैं, खुश रहना, दोस्तों अलविदा
तुम अपना ख्याल रखना, दोस्तों अलविदा

तुम चाहो ये जहां, सो तुम्हें ये जहां मुबारक
हमारी चाहत जग दूजा, दोस्तों अलविदा

चार दिन जो साथ गुज़रे याद रहेंगे बरसों
था शायद वक्त बस इतना, दोस्तों अलविदा

उम्र भर बने रहे मील का पत्थर, इसके आगे
राह तुम्हारी कौन तकता, दोस्तों अलविदा

जीते जी दुनिया को हमने सिर्फ़ तबस्सुम बांटे
याद हमारी बटोर रखना, दोस्तों अलविदा

 

हम रोएंगे नहीं

कोई छोड़ के जाएगा घर, हम रोएंगे नहीं
बात रोने की तो है मगर हम रोएंगे नहीं

पांव में छाले, राह में जंगल, साथ कोई नहीं
माना कठिन है ये सफ़र, हम रोएंगे नहीं

तूफ़ानों ने पहले भी रोका है रास्ता अपना
खोई है आज फिर डगर, हम रोएंगे नहीं

तेरी खातिर अपनी खुशियां बेच दीं और तू
गैर के पहलू में आया नज़र, हम रोएंगे नहीं

हमें पता है पत्थर को भी काटता है पानी
कहीं वो जाए ना बिखर, हम रोएंगे नहीं

अब तो लहू नहीं बेहिसी दौड़ती है बदन में
आए अब कैसी भी खबर, हम रोएंगे नहीं

हमें खौफ नहीं संजीदगी से, यकीं मानो
हमें बस इस बात का डर, हम रोएंगे नहीं

हमारे हौसले आज़माता आया है ज़माना
आ देख ले तू भी सितमगर, हम रोएंगे नहीं

V-Day 2021

जब लिख चुके हो तो मिटाना कैसा
जो हाथ पकड़ा है तो छुड़ाना कैसा

तुम इज़हार-ए-वफ़ा क्यूँ नहीं करते
गर इश्क़ है तो फिर छुपाना कैसा

ख़फ़ा हो के कुछ यूँ हसीन लगते हो
सोचता हूँ अब तुमको मनाना कैसा

हमारा क़िस्सा मुकम्मल ना हो पाएगा
इसे यहीं ख़त्म करो, और बढ़ाना कैसा

यक़ीं नहीं आता इतने बेरहम हो तुम
इक बार ना पूछा, है मेरा दीवाना कैसा

मैं छोटा सही अपने ईमान पे क़ायम हूँ
जुगनू से पूछो रात भर जगमगाना कैसा

नहीं आती

वो जाने तमन्ना अब इधर नहीं आती
वादा करती तो है मगर नहीं आती

तूफान समंदर में आता है अचानक
फिर कोई भी कश्ती घर नहीं आती

आसुओं से भीगी है कुछ इस क़दर
आईनों को ये सूरत नज़र नहीं आती

कुछ बातें मिलने पे ही हो सकती है
फ़ोन पे आवाज़ अक्सर नहीं आती

इस क़दर कार-ए-जहां में हूं मुब्तिला
मुझे तो खुद अपनी खबर नहीं आती

जाने कब से चले जा रहे हो बोलो तो
क्या सच में मंज़िल नज़र नहीं आती

है डर टूट ना जाएं सपने इसी लिए
शायद मुझे नींद रात भर नहीं आती

एहतिजाज

अब क्या सोचें जला किसका घर
मिली महल को तो रोशनी बराबर

मान ली सूरज ने भी हार शाम तक
फैली है तारीकी ता-हद-ते-नज़र

तारीफ़-ए-साहिब-ए-शहर है लाज़मी
सी लो लब, रख लो दिल पे पत्थर

मैं बहुत छोटा हूँ मगर मेरी भी ज़िद है
दस्तार उतरने से सर कटाना बेहतर

हमारी आवाज़ को बंदूक़ों से दबाओगे
देख ली तेरी बहादुरी ओ सिकंदर

इसे मासूम बच्चों से भी नहीं हमदर्दी
बेहतर है जल जाए तुम्हारा शहर

‘ओझल’ की ग़ज़लों में जाने कहाँ से
भर आया है ज़माने भर का ज़हर

सफर तवील है

सफर तवील है, पुराना है
चले इक उम्र, चलते जाना है

मुखौटों के शहर में लोगों ने
मुझे तबस्सुम से पहचाना है

ढूँढ ही लेते हैं राह दिलावर
थकान का तो बस बहाना है

अजीब शर्त रखी है मेरे यार ने
दर्द सहना है, मुस्कुराना है

मैं तुझ तक आऊंगा भला कैसे
मेरी राह में इक ज़माना है

दुःख और दर्द

दुःख और दर्द में फ़र्क़ है इतना

दर्द पहाड़ी झरना है
शोर करता है
पत्थरों पे टूटता है
सब कुछ बिखेर देता है

दुःख
एक शांत नदी है
मद्धम स्वर में बोलती है
चलती है यूँ जैसे हो ही नहीं
मगर हर वक़्त होती है साथ
आपको घेरे हुए
बाहों में समेटे हुए

दर्द
अँधेरी रात में कमरे के बीच की
मेज से लगने वाली ठोकर है
घुटने छिल जाते हैं
नसें फड़कती हैं
चीख निकलती है
चोट जो लगती है
सबको दिखती है

दुःख एक खंजर है
अंतड़ियों में फंसा हुआ
जिसमें से रिसता है लहू
बरबस अनायास लगातार
आपकी शर्ट के रंग को गहराता हुआ
दुःख जब निकलता है जान निकलती है