जुगनू से ली रोशनी

माँगी ख़ुशबू फूल से, जुगनू से ली रोशनी
कुछ खून-ए-जिगर डाला, तब हुई शायरी

सफ़र हर रिश्ते का है, साँस के चलने तलक
बाद-ए-मर्ग क्या मुहब्बत, दोस्ती, दुश्मनी

यार तू बैठा है तनहा, इस तरह क्यूँ हार के
जो देखे ज़रा तू ग़ौर से, है ख़ुशरंग ज़िंदगी

देखने को ख़्वाब आँखें बंद करनी पड़ती हैं
आवाज़ के शहर में कैसे सुने कोई खामोशी

थक रही उँगलियाँ दम निकलता है ‘ओझल’
मेरे उजालों के सफ़र की मंज़िल है तीरगी

 

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