हमने सुना है

दूर नदी के पार कुछ परियां रहती हैं, हमने सुना है
इस जहां के बाद इक दुनिया मिलती है, हमने सुना है
अँधेरा दौड़ता फिरता है, चीखता है सौ ज़ुबानों में
रौशनी कहानियां चुपचाप लिखती है, हमने सुना है

इस तरह

तन्हा रातों में चांदनी की तरह
वो साथ है मेरे खुशी की तरह

कहीं भी जाऊं साथ होती है मेरे
याद उसकी रौशनी की तरह

चाह कर भी छोड़ ना पाया उसे
थी आदत वो मयकशी की तरह

मैं एक बेसुरा उदास गीत ठहरा
वो थी किसी रागिनी की तरह

पी गया हर ज़ख्म जो तूने दिया
था ज़ब्त किसी नदी की तरह

मुझे यकीं है तेरे हर वादे पर
इक काफ़िर की बंदगी की तरह

लगता है डर आईनों से मुझे
मिलूं खुद से अजनबी की तरह

पतझड़ के मौसम में

चेहरे पे जो रंग ए गुल खिला है पतझड़ के मौसम में
क्या तुमको कोई तुमसा मिला है पतझड़ के मौसम में

आंगन में दौड़ते फिरते हैं चीखते हुए जर्द पत्ते
कोई पूछे इनसे क्या इब्तिला है पतझड़ के मौसम में

मौसम ए बहार में जिसकी कसमें खाई थीं हमने
उस इश्क का खूॅं बहा है पतझड़ के मौसम में

हजार बार समझाया है अपने दिल को यारों
मगर ये जां देने पे तुला है पतझड़ के मौसम में

उसके सीने पे रख कर सिर रोए हम देर तलक
बोझ जी का हल्का हुआ है पतझड़ के मौसम में

मेरी पेशानी पे देखो बरसों की लिखावट है
यादों का मौसम लौटा है पतझड़ के मौसम में

कोई पंछी, कोई बच्चा, कोई प्रेमी, ना कोई आस
घर खामोशी में मुब्तिला है पतझड़ के मौसम में

उदासी

साथ मेरे रही हर घड़ी उदासी
हरेक सांस में थी पली उदासी

ढूंढते कोई हमसफ़र भला क्यूं
हर क़दम हमें मिली उदासी

मुस्कुराया था मैं इक लम्हे को
बा’द उसके फिर घिरी उदासी

रही पलकों पर टिकी रात भर
सुबह आँखों से टपकी उदासी

खुशी की तरफ़ देखते रहे हम
हमें मगर थी ताकती उदासी

किरन आस की उठी ज़रा सी
ज़माने भर की गिरी उदासी

जी चाहता है

गम जहां के भूल जाऊं, जी चाहता है
बच्चों की तरह मुस्काऊं, जी चाहता है

पी के आंखों के समंदर को मैं अपने
खूब हंसू, खिलखिलाऊं, जी चाहता है

आज फिर बाहों में लेके उस हसीं को
जी महफ़िल का जलाऊं, जी चाहता है

गुम रहा अपने ख्यालों में मैं बरसों
जी किसी का बहलाऊँ, जी चाहता है

आने वाली नस्लें भी करें याद मुझको
पेड़ फलों के लगाऊं, जी चाहता है

बादल

सुबह सवेरे घिर आए बादल
जाने कहां से फिर आए बादल

आज फिर सोच रहा था तुमको
आज आंख में फिर आए बादल

सारे ज़माने का सफर कर के
जैसे घर मुहाजिर आए बादल

धूप से जलने लगा था बदन
मुझे बुझाने खातिर आए बादल

तरसती नजरों ने आस छोड़ दी
बाद उसके नज़र आए बादल

देखे

रंग दुनिया के बदलते देखे
दिल पत्थर पिघलते देखे

रौशनी की तलाश में हमने
घर कितने ही जलते देखे

आजमाते दुश्मनों को क्या
दोस्त सारे बदलते देखे

ख़्वाब जितने देखे हमने
पा-ए-वक्त कुचलते देखे

तरक्की के भूखे लोगों के
पांव यहां फिसलते देखे

दिन भर रहे चमकते जो
सूरज वो भी ढलते देखे

कल शाम

कल शाम आंखों को मैंने सेहरा किया
औ’ उफ़ुक़ पे खुद को डूबते देखा किया

पहले बनाया हमने साए को हमसफ़र
फिर उम्र भर उस साए का पीछा किया

आज भी मसरूफ रहे कार-ए-जहाॅं में
यानी आज का दिन भी ज़ाया किया

इक नाकाम आशिक़ का दिल हो जैसे
सांझ का सूरज कुछ यूं दहका किया

किस्से तुम्हारे फिर से सुनाए यारों को
फिर दिल के ज़ख्मों को ताज़ा किया

आंखों को ज़िद्द थी उस मंज़र की सो मैं
हर महफ़िल हर जा उसे खोजा किया

शाम के साथ

रंग कितने बिखर जाते हैं शाम के साथ
दर्द भूले हुए याद आते हैं शाम के साथ

दिन भर साथ रहती है इक झूठी हंसी
सच्चे हैं गम चले आते हैं शाम के साथ

कोई साथ चलेगा भी कितनी दूर भला
हम भी ज़रा सुस्ताते हैं शाम के साथ

शमा उम्मीदों की बुझने लगती है औ’ हम
ओढ़ उदासी सो जाते हैं शाम के साथ

दिन भर जिनको तवज्जो नहीं मिलती
वही चिराग काम आते हैं शाम के साथ

तू भी याद आता है बेइंतिहां हमें जब
कोई ग़ज़ल गुनगुनाते हैं शाम के साथ

महक उठता है ये घर लोबान की तरह
जिस रोज़ दोस्त आते हैं शाम के साथ

जिए जा रहे हैं

तेरे सच्चे झूठे वादों पे जिए जा रहे हैं
तू ज़हर है जिंदगी, हम पिए जा रहे हैं

तुम्हें अपने आगे दिखता नहीं कोई
हम इक जहाॅं कांधे पे लिए जा रहे हैं

हाकिम-ए-शहर को है डर सच्चाई से
सारे आलिम लब अपने सिए जा रहे हैं

यूं तो हाथ उठाने की भी नहीं क़ुव्वत
जीना है जरूरी, सो हम जिए जा रहे हैं

अपना साया भी आता नहीं नज़र हमें
सारी दुनिया को रौशन किए जा रहे हैं

आजा कि शाम से फिर तेरे इंतज़ार में
नीम-कश बादा-ए-ग़म पिए जा रहे है