खुल के

तुम्हारे बाद किसी को चाहा नहीं खुल के
जश्न ए ज़िंदगी फिर मनाया नहीं खुल के

मैं जानता था वो निकलेगा बेवफ़ा सो
मैंने हाल-ए-दिल उसे बताया नहीं खुल के

हुआ है जिसके हुनर का दीवाना ये जहां
एक भी गीत उसने गाया नहीं खुल के

लुत्फ तेरी नाराज़गी का खो न जाए कहीं
हमने इस डर से तुझे मनाया नहीं खुल के

बताएंगे किस किस को ये राज़ भला हम
तूने हमको गले से लगाया नहीं खुल के

हो सके तो कोई ग़ज़ल सुनाते जाओ इसे
‘ओझल’ इक उम्र से मुस्कुराया नहीं खुल के

नहीं होगा

यूं कदम कदम पर संभलने से नहीं होगा
ये इश्क है मियां! ऐसे डरने से नहीं होगा

चाहते हो बेहतर दुनिया तो बदलो खुद को
ये काम सिर्फ़ दुनिया बदलने से नहीं होगा

ज़रा पहचान रास्तों की भी ज़रूरी है लोगों
हासिल-ए-मंज़िल यूं ही चलने से नहीं होगा

मज़ा तो तब है कि जहां को रौशनी मिले
और तो कुछ हमारे जलने से नहीं होगा

जब मुझसे ख़फ़ा हैं मेरे अपने ही ‘ओझल’
मैं जानता हूं फ़ायदा सुधरने से नहीं होगा

चल

मन छोड़ अंधेरों की छांव चल
चल आज रौशनी के गांव चल

कोई रास्ता ना दे दिखाई तुझे
तू रख के बादलों पे पांव चल

वक्त से जीत सका कौन यहां
तू फिर भी मगर इक दांव चल

एक कहानी

बड़ी पुरानी बात है
यहां से बहुत दूर
एक नदिया बहती थी
उस नदिया के तट पर
एक छोटा सा गांव था।

दूर नदी के तट पर
जो छोटा सा गांव था
उस गांव के कोने में
एक पुराना घर था।

दूर गांव के कोने में
जो पुराना घर था
उस घर में एक आंगन था
आंगन में एक पेड़ था।

दूर घर के आंगन में
एक पेड़ की एक डाल पे
एक गौरय्या रहती थी।
उस गौरय्या ने
एक घोंसला बनाया था
घोंसले में उसके नन्हे मुन्ने बच्चे थे।

आंगन के पेड़ की डाल पे
गौरय्या के घोंसले में
बच्चे दिन भर खेलते थे
खूब शोर मचाते थे।

गौरय्या के बच्चे
खेलते कूदते बड़े हुए
और फिर वो उड़ गए।

नदिया अब भी बहती है
इक कहानी कहती है।
उस कहानी में अब भी
दूर नदी के तट पर
एक सूना सा गांव है
उस गांव के कोने में
एक वीराने घर के
सुनसान आंगन में
एक पुराने पेड़ की
डाल पे एक खाली सा
गौरय्या का घोंसला है।

पलट जाना चाहिए

रास्ते से पलट जाना चाहिए
शाम ढले घर जाना चाहिए

कहते हैं शोर मचाने के बाद
आपको चुप हो जाना चाहिए

और क्या मिलेगा हमको यहां
जीने का कोई बहाना चाहिए

वो आएँ न आएँ मर्ज़ी उनकी
हमें तो अहद निभाना चाहिए

तीर आंखों में लिए फिरते हैं वो
शिकार को निशाना चाहिए

बिस्तर की सिलवटें कहती हैं
इन्हें ख़्वाब वही पुराना चाहिए

अच्छा नहीं किया

ज़ुल्म खामोश नहीं सहा, अच्छा नहीं किया
हाकिम को जवाब दिया, अच्छा नहीं किया

यूँ तो सबने देखे उसके खूॅ़ से सने हाथ
तुमने उसे क़ातिल कहा, अच्छा नहीं किया

हुज़ूर इक छोटी सी बात कहनी थी हमें
आपने हमें बख्श दिया, अच्छा नहीं किया

खंजर के वास्ते हमारा सीना था मौजूद
तूने वार पीठ पे किया, अच्छा नहीं किया

माना कि बुलंदियों की थी चाह बहुत ‘ओझल’
मगर ईमान बेच दिया, अच्छा नहीं किया

रात भर

इक दिल तड़पता रहा रात भर
इक दर्द का दरिया बहा रात भर

इक हूक सी उठती रही सीने में
इक अनजान सा नगमा रात भर

इक फांस सीने से नहीं निकली
इक ज़ख्म रिसता रहा रात भर

इक आस टूट के भी साथ रही
इक ख्वाब आंखों में रहा रात भर

इक चेहरा रौशन रहा आंखों में
इक याद जो सहारा था रात भर

इक रात जो उम्र से तवील रही
इक लम्हा जो ना कटा रात भर

आंसू

पलकों पे हमारी पलते हैं आंसू
दिल नदी में मचलते हैं आंसू

दिखते हैं पानी की धार के जैसे
छू लो इन्हें तो जलते हैं आंसू

खुशी हो या गम, देते हैं साथ ये
कभी तो बेवजह ढलते हैं आंसू

देख के इनको मत फेरो निगाहें
सुनो गौर से क्या कहते हैं आंसू

दर्द जहां का समेटे हुए खुद में
तन्हाइयों में रक्स करते हैं आंसू

शाम होते ही चले आते हैं देखो
रात फूलों से महकते हैं आंसू

क्या

गले लगाने की मांगते हो इजाज़त क्या
इतना डरते हो तो करोगे मुहब्बत क्या

जो जा चूका है तकते हो उसकी राह क्यूँ
ऐसे एकतरफ़ा होती है उल्फ़त क्या

अभी गुज़ारे हैं हमने साथ कोई चार बरस
इसे रिश्ते का नाम देने की है उजलत क्या

हमें पता है हमारी शर्ट पे हैं दाग बहुत
तुम्हे है इन पे हंसने की अब ज़रुरत क्या

मिले आज जो बरसों में तो लगते हो गले
सुना है कहते थे हमारी कोई निस्बत क्या

ये जो खुद को मिटाने पे तुले हो ‘ओझल’
है तुमको ज़िन्दगी से भला शिकायत क्या

क्या लिखूं

एक सादा कागज़
सामने रहा देर तक
सोचता रहा मैं क्या लिखूं उस पर
कई छंद सोचे, भुला दिए
कुछ रेखाएं खींची, मिटा दीं

ज़ह्न-ओ-दिल देर तक उलझते रहे
कभी कलम उठाते गिराते रहे
कभी कागज़ उलटते पलटते रहे

सुना था कुछ भी सदा नहीं रहता
क्या लिखे जो कभी न मिट जाने वाला हो

लिखना सोच को उम्र अता करना ठहरा
लिखना शब्द को अमर करना ठहरा

अंत में थक कर लिखा मैंने
नाम तुम्हारा ।