इश्क

इश्क होने
और इश्क करने में
बस उतना ही फ़र्क होता है
जितना
इंसान होने
और इंसान बनने में।

सफ़र

था कठिन औ’ अँधेरा सफ़र
चला उम्र भर लंबा सा सफ़र

साथ चलते थे कई काफ़िले
लगा जाने क्यूँ तन्हा सफ़र

रौशनी राह में कम तो न थी
दिया दिखाई अँधा सफ़र

फूल ही फूल थे राहों में
लगा कांटो से भरा सफ़र

दिखायेगा हमें राह क्या वो
जिससे देखा नहीं गया सफ़र

हर कदम पर मिली मौत हमें
पूछते क्या हो था कैसा सफ़र

जाना चाहिए

थकन कहती है ठहर जाना चाहिए
बहुत चले हैं, अब घर जाना चाहिए

किया है वादा तो वायदे की खातिर
आग के दरिया से गुज़र जाना चाहिए

इक धुंध सी फैली है आज हर सू मेरे
कोई तो बता दे किधर जाना चाहिए

जिस की राह पर मिलें दर्द दूसरों को
तुम्हें उस अहद से मुकर जाना चाहिए

तूफ़ानों से तन्हा लड़ने वाले शजर को
पंछियों के बोझ से बिखर जाना चाहिए

दिल चाहता है इक और खता ‘ओझल’
उम्र कहती है अब सुधर जाना चाहिए

वो तुम थे

दश्त में फूल खिला था, वो तुम थे
बारिश में कतरा धूप का, वो तुम थे

मुझे संवारने में उम्र गुज़ारी जिसने
शायद मैं भूल गया था, वो तुम थे

कारवां की ख्वाहिश क्यूं होती मुझे
दिखाता रहा जो रास्ता, वो तुम थे

उकता के दुनिया से दूर जा बैठा जब
जो साथ मेरे खड़ा रहा, वो तुम थे

वैसे कौन सुनता कहानी मेरी मगर
उससे एक नाम जुड़ा था, वो तुम थे

इक तरफ़ ज़माना था, इक तरफ़ अना
बीच में न पूछो कौन था, वो तुम थे

मेरी हर बदसलूकी के बावजूद मुझे
गले जो लगाता रहा था, वो तुम थे

दूर तक फैला था खामोशी का सहरा
इक आवाज़ का दरिया था, वो तुम थे

ये दुनिया पागलखाना है

सब यहां हैं दीवाने, ये दुनिया पागलखाना है
चल यार चलें मयखाने, ये दुनिया पागलखाना है

कल का अपने पता नहीं, फिर भी हरेक शख्स
खुद को है खुदा माने, ये दुनिया पागलखाना है

मुझसे थोड़ी सी दूरी लाज़मी है तेरी वगरना
बन जायेंगे अफ़्साने, ये दुनिया पागलखाना है

मुझको पत्थर मारने वाली भीड़ में शामिल हैं कितने
चेहरे जाने पहचाने, ये दुनिया पागलखाना है

जिस हुजूम ने तुमको सर आंखों पे बिठाया है
आयेंगे वो तख्त गिराने, ये दुनिया पागलखाना है

जो कहा करते थे मुझसे कर डालो जो जी चाहे
खुद ही लगे घबराने, ये दुनिया पागलखाना है

मुझे सिखाते थे कायदे इस दुनिया में जीने के जो
वो ही लगे समझाने, ये दुनिया पागलखाना है

नहीं आसाॅं

जीना आसाॅं है ना मर जाना आसाॅं
ना रास्ता आसाॅं ना घर जाना आसाॅं

ये दिल के रिश्ते हैं पुल रामेश्वरम के
बनाना आसाॅं है ना मिटाना आसाॅं

ये सफ़र-ए-तालीम उम्र भर चलेगा
सीखना आसाॅं ना सिखाना आसाॅं

मुश्किल नहीं तर्क-ए-तअ’ल्लुक मगर
याद रखना आसाॅं ना भुलाना आसाॅं

दिल मेरा है नादान बच्चों की तरह
रुलाना आसाॅं और हँसाना आसाॅं

कश्मकश में है दाग़-ए-दिल-ओ-गैरत
छुपाना आसाॅं है ना दिखाना आसाॅं

आ गए

थक गए थे चलते चलते, घर आ गए
देखते हैं दीवार-ओ-दर, किधर आ गए

हमारे काफ़िले को किसकी नज़र लगी
एक सहरा खोजते थे औ’ शहर आ गए

अपने खूँ से सींचा इस बाग को ताउम्र
क्यूं हर शजर के हाथ में पत्थर आ गए

हर शख़्स देखता है हिकारत से क्यू हमें
ये कैसी महफ़िल है, हम किधर आ गए

हमारे अहद का यहां नहीं है कोई मोल
खूब जानते थे हम, देखो मगर आ गए

क्या बताएं कैसे ऐश से रहते थे हम वहां
क्या कहें क्यूं छोड़ गांव, नगर आ गए

माना बहुत कठिन है जीना इस दौर में
फिर भी कुछ कर चलो, अगर आ गए

हम दोनों

इक सदी से प्यासी धरती की आरज़ू हम दोनों
गंगा जमुना सरस्वती और सरजू हम दोनों

जेठ की गर्म दुपहरी में चलती हुई लू हम दोनों
पहली पहली बारिश का महका जादू हम दोनों

दूर चमकती कहकशां में हर-सू हम दोनों
चांद, सितारे, कंदीलें, दीपक, जुगनू हम दोनों

वीराने जंगल में फिरते आखिरी आहू हम दोनों
सावन में पीले सरसों की मादक खुशबू हम दोनों

मुस्कान, गुस्सा, खामोशी, दर्द, आंसू हम दोनों
कोमल दिल, मज़बूत कांधे, सख़्त बाज़ू हम दोनों

बेहतर दिनों के

बेहतर दिनों के नए इम्कान दिखाते हैं
है अंधेरा बहुत चलो कोई दीप जलाते हैं

यारों तुम्हारे शहर में अब जी न सकेंगे
इंसाॅं नहीं कोई, यहां सब खुदा कहाते हैं

ये जो आज बुलंदियों पे फिरते हो इतराते
आओ तुम्हारी तुमसे पहचान कराते हैं

इक तुम कि खफ़ा हो जाते हो यारों से भी
इक हम कि दुश्मन को भी गले लगाते हैं

ये ऐसा जज़्बा है जो मर कर नहीं मिटता
अहले वफ़ा जां दे के भी अहद निभाते हैं

कलेजा चाहिए होता है मुस्कुराने में लोगों
अश्कों का क्या है, ये यूं ही चले आते हैं

यारों दुआ करो

हर लम्हा खिलखिलाता रहे, यारों दुआ करो
उसे किसी की नज़र न लगे, यारों दुआ करो
 
मैंने माना वो मेरा हमराह नहीं अब मगर
थोड़ी दूर मेरे साथ तो चले, यारों दुआ करो
 
जो दर पे मेरे कांटे बिखेर गया, उसकी
राहों में गुल ही गुल खिलेंं, यारों दुआ करो
 
रख दिया है अपना हाथ मेरे हाथ में उसने
ये हाथ अब ताउम्र ना छूटे, यारों दुआ करो
 
बसते जाते हैं शहर, हुए जाते हैं जंगल गुम
कोई शजर ना बेवजह कटे, यारों दुआ करो
 
जिस तरह इक शाम हुआ था जुदा मुझसे
यकायक कहीं वो आ मिले, यारों दुआ करो
 
मेरे हाल पे हंसने वालों में शरीक थे तुम भी
कभी कोई तुम पे ना हंसे, यारों दुआ करो